स्त्री
स्त्री सोचती हूं बनाया किसने होगा यह रिश्ता क्या है इस रिश्ते का अर्थ रचे हैं महाकाव्य बड़े-बड़े जिस पर बड़े-बड़े कवियों ने कहते हैं जो फैला है प्यार ही प्यार हर जगह मिलता है यह समर्पण करने पर तन मन धन से पर प्यार प्यार नहीं रह जाता हो जाती है सचेत जब नारी आज की आधुनिक युग की मांगती है अधिकार अपने जागे हैं जो मन में उसके एक दिन में नहीं हजारों सालों तक रहने पर कैद निरंतर जुल्मों को सहते सहते समर्पण करने पर भी मिली न उसे जब प्यार की एक बूंद बात अधिकारों की करते ही बन रहे थे जो उसके अपने अब किनारा करने लगे थे जो मर्यादा के अंदर अब पांव बाहर निकालने लगे होने लगे शुरू बात बात में होने लगी जख्मी वह हर बात में बन रहे थे देवी व देवता जो अभी तक बातों व क्रूर हाथों से अब पिशाच बनने लगे जकड़ने लगे उस अबला नारी को कसने लगा उनका खूनी पंजा होने लगा प्रयास खत्म करने का उसी प्राण प्यारी को जो सोती थी कभी अपने प्रिय की गोद में सो रही है आज धरती की गोद में कर दी गई है समाप्त जिसके जीवन की लीला चली गई है आज वह इस संसार से थी कभी जो फूल अपनी मां के आंचल का...,। ...