आज का युवा
आज का युवा: छिटके कतरा कतरा कर बिखरे बादल आभास देते हैं वर्तमान युग के युवा की मन: स्थिति का कौनसी धरती अथवा क्षेत्र उगलेगा सोना सोच में ही छिन गया है बचपन व जवानी उससे रह नही गया है वक्त पास उसके चैन से सांस लेने व बैठने का जमाना एक था जब युवा था बेखबर था किंतु आशावान था दिल में सुकून जमाना एक यह भी है जब खबरें उसे रहने नहीं दे रही हैं बेखबर कह रहीं हैं यहां दौड़ो वहां दौड़ो खत्म होती है जब यह अंधी दौड़ जुटा पाता है जब तक वह चैन के साधन बीत चुके होते हैं वह लम्हे व क्षण जिन्हें जीना चाहता था वह जिन्हें जीने के लिए लगाई थी दौड़ उसने जान पाता है सही अर्थ दौड़ का जब तक हो जाती है जिंदगी की शाम तब तक हो जाती है जिंदगी की शाम तब तक...। डॉ मंजुला पांडेय