अपराजिता
अपराजिता चंदा को देखते देखते बादलों में खोते चिड़ियों संग बातें करते सखियों संग बतियाते हंसी ठिठोली करते मां से चोटी बनवाते कब वह चुप सी हो गई पता ही नहीं चला......। फूल से सुकुमार उसके कोमल मन ने एक के बाद एक सहे कई आघात नर्म पंखुड़ियों से मुलायम उसके हाथों ने गिट्टे खेलते खेलते कब पकड़ ली चाबी एक दूसरे संसार की पता ही नही चला....। रखना था मान जहां सभी का चलना था संभल संभल कर निभानी थी जिम्मेदारियां भूल जाना था खुद को अपने अस्तित्व व अहम को अपनी कल्पनाओं के सुंदर संसार के किवाड़ कब उसने बंद कर दिए पता ही नहीं चला ......। अपनी भावनाओं के रेशमी पर्दों को कब उसने तार तार कर दिया कब वह गुड़िया से दादी , नानी बन गई और खो गई सब की ख्वाहिशें पूरी करने में पता ही नहीं चला .......। दिन ,महीने ,साल गुजरते चले गए पैर रखती चली गई दहकते अंगारों पर मुलाकात होती रही उसकी जिंदगी के हर मोड़ पर...