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अपराजिता

अपराजिता चंदा को देखते देखते  बादलों में खोते  चिड़ियों संग बातें करते  सखियों संग बतियाते   हंसी ठिठोली करते  मां से चोटी बनवाते  कब वह चुप सी हो गई  पता ही नहीं चला......। फूल से सुकुमार उसके  कोमल मन ने  एक के बाद एक  सहे कई आघात  नर्म पंखुड़ियों से मुलायम उसके हाथों ने गिट्टे खेलते खेलते  कब पकड़ ली चाबी एक दूसरे संसार की  पता ही नही चला....।  रखना था मान  जहां सभी का  चलना था  संभल संभल कर  निभानी थी जिम्मेदारियां भूल जाना था  खुद को अपने अस्तित्व व अहम को अपनी कल्पनाओं के  सुंदर संसार के किवाड़  कब उसने बंद कर दिए  पता ही नहीं चला ......। अपनी भावनाओं के  रेशमी पर्दों को  कब उसने  तार तार कर दिया  कब वह गुड़िया से दादी , नानी बन गई और  खो गई सब की  ख्वाहिशें पूरी करने में  पता ही नहीं चला .......। दिन ,महीने ,साल  गुजरते चले गए  पैर रखती चली गई  दहकते अंगारों पर  मुलाकात होती रही उसकी  जिंदगी के हर मोड़ पर...

आज का युवा

         आज का युवा: छिटके कतरा कतरा कर बिखरे बादल आभास देते हैं वर्तमान युग के युवा की मन: स्थिति का कौनसी धरती अथवा क्षेत्र उगलेगा सोना सोच में ही छिन गया है  बचपन व जवानी उससे रह नही गया है  वक्त पास उसके चैन से सांस लेने  व बैठने का जमाना एक था  जब  युवा था बेखबर  था किंतु आशावान था दिल में सुकून जमाना एक यह भी है  जब खबरें उसे  रहने नहीं दे रही  हैं बेखबर कह रहीं हैं यहां दौड़ो वहां दौड़ो खत्म होती है  जब यह अंधी दौड़ जुटा पाता है जब तक  वह चैन के साधन बीत चुके होते हैं वह  लम्हे व क्षण जिन्हें जीना चाहता था वह जिन्हें जीने के लिए  लगाई थी दौड़ उसने  जान पाता है सही अर्थ  दौड़ का जब तक हो जाती है  जिंदगी की शाम तब तक  हो जाती है  जिंदगी की शाम तब तक...। डॉ मंजुला पांडेय 

स्त्री

स्त्री सोचती हूं बनाया  किसने होगा यह रिश्ता क्या है इस रिश्ते का अर्थ रचे हैं महाकाव्य बड़े-बड़े जिस पर बड़े-बड़े कवियों ने कहते हैं जो फैला है प्यार ही प्यार हर जगह मिलता है यह समर्पण करने पर तन मन धन से पर प्यार प्यार नहीं रह जाता हो जाती है सचेत जब नारी आज की आधुनिक युग की मांगती है अधिकार अपने जागे हैं जो मन में उसके एक दिन में नहीं हजारों सालों तक  रहने पर कैद निरंतर जुल्मों को सहते सहते समर्पण करने पर भी मिली न उसे जब प्यार की एक बूंद बात अधिकारों की करते ही बन रहे थे जो उसके अपने  अब किनारा करने लगे थे जो मर्यादा के अंदर अब पांव बाहर निकालने लगे होने लगे शुरू बात बात में होने लगी जख्मी वह हर बात में बन रहे थे देवी व देवता जो अभी तक बातों व क्रूर हाथों से अब पिशाच बनने लगे जकड़ने लगे उस अबला नारी को कसने लगा उनका खूनी पंजा होने लगा प्रयास खत्म करने का उसी प्राण प्यारी को जो सोती थी कभी अपने प्रिय की गोद में सो रही है आज धरती की गोद में कर दी गई है समाप्त जिसके जीवन की लीला चली गई है आज वह इस संसार से थी कभी जो फूल अपनी मां के आंचल का...,।       ...

कविता: विनम्र श्रद्धांजलि लता जी को......

सो गई हैं वह अब सदा सदा के लिए.....         भेजा था मां वीणा ने       अपनी पुत्री लता जी को      धरती पर संगीत से  दिखाने के लिए  जिंदगी की धूप छांव  हंसता खिलखिलाता बचपन  जवानी की मदहोशियां  कलियों का खिलना  बहारों का मुस्कुराना  चांद में खोना  चांदनी में नहाना  बादलों में छुप जाना  घटा का छाना  बर्फ की ठंडक  झरने का मादक संगीत  तरुणी की अल्हड़ता  जुल्फों के घने साये  वृक्षों से छन कर आती  स्वर्ण रश्मियां शाम का ढलना  दिन ‌का छुप जाना  प्रेमी प्रेमिका का  एक दूजे में खोना  सपने देखना  वतन पर मर मिटना  संसार की असारता  ईश्वर की सत्ता  जड़ व चेतन प्रकृति का सौंदर्य  क्या कुछ नहीं सुनाया  लता जी ने संगीत से अपने  धरती के जीवो को  दे दिया है विराम अब  सदा सदा के लिए  अपनी वाणी को  बुला लिया है मां वीणा ने  अपनी पुत्री को  सो गई है वह अब सुकून से  अनंत काल के लि...

अग्नि परीक्षा

जन्म से मृत्यु पर्यंत देता है परीक्षा हर जीव इस मृत्युलोक में एक बार नहीं कई बार कभी स्वयं को सिद्ध करने की खातिर तो कभी रिश्तो को जिंदा रखने की खातिर हर क्षण हर पल पग पग पर होती है उसकी परीक्षा यह बात जानने के लिए कहीं दूर नहीं अपितु अपने आसपास की प्रकृति को ही देखना काफी है धूप में जल जल कर मुरझा चुके पीले पत्ते कहते हैं अपनी कहानी कभी आंधी कभी तूफान कभी धूप कभी बरसात किस-किस ने ली नहीं उनकी परीक्षा ठीक इसी प्रकार तिनका तिनका बटोर कर  घोसले बनाते पक्षी घोसले की रक्षा की खातिर देते हैं अग्नि परीक्षा अपने शिशु को धरती पर  लाने की खातिर देती है हर मां अग्नि परीक्षा अपने अस्तित्व को सिद्ध करते करते  बीत जाता है जीवन एक औरत का पर होता नहीं है अंत अग्नि परीक्षा का....।         डॉ मंजुला पांडेय