अग्नि परीक्षा
जन्म से मृत्यु पर्यंत
देता है परीक्षा हर जीव
इस मृत्युलोक में
एक बार नहीं
कई बार
कभी स्वयं को
सिद्ध करने की खातिर
तो कभी रिश्तो को
जिंदा रखने की खातिर
हर क्षण हर पल
पग पग पर
होती है उसकी परीक्षा
यह बात जानने के लिए
कहीं दूर नहीं अपितु
अपने आसपास की
प्रकृति को ही
देखना काफी है
धूप में जल जल कर
मुरझा चुके पीले पत्ते
कहते हैं अपनी कहानी
कभी आंधी कभी तूफान
कभी धूप कभी बरसात
किस-किस ने ली नहीं
उनकी परीक्षा
ठीक इसी प्रकार
तिनका तिनका बटोर कर
घोसले बनाते पक्षी
घोसले की रक्षा की खातिर
देते हैं अग्नि परीक्षा
अपने शिशु को धरती पर
लाने की खातिर
देती है हर मां
अग्नि परीक्षा
अपने अस्तित्व को
सिद्ध करते करते
बीत जाता है जीवन
एक औरत का
पर होता नहीं है अंत
अग्नि परीक्षा का....।
डॉ मंजुला पांडेय
एक कटु यथार्थ की अत्यंत सार्थक अभिव्यक्ति ! मंजुला जी बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर सशक्त रचना के लिए ! हार्दिक शुभकामनाएं !
ReplyDeleteVery good
ReplyDeleteहार्दिक आभार सुधीर जी
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