कविता: विनम्र श्रद्धांजलि लता जी को......
भेजा था मां वीणा ने
अपनी पुत्री लता जी को
धरती पर संगीत से
दिखाने के लिए
जिंदगी की धूप छांव
हंसता खिलखिलाता बचपन
जवानी की मदहोशियां
कलियों का खिलना
बहारों का मुस्कुराना
चांद में खोना
चांदनी में नहाना
बादलों में छुप जाना
घटा का छाना
बर्फ की ठंडक
झरने का मादक संगीत
तरुणी की अल्हड़ता
जुल्फों के घने साये
वृक्षों से छन कर आती
स्वर्ण रश्मियां
शाम का ढलना
दिन का छुप जाना
प्रेमी प्रेमिका का
एक दूजे में खोना
सपने देखना
वतन पर मर मिटना
संसार की असारता
ईश्वर की सत्ता
जड़ व चेतन प्रकृति का सौंदर्य
क्या कुछ नहीं सुनाया
लता जी ने संगीत से अपने
धरती के जीवो को
दे दिया है विराम अब
सदा सदा के लिए
अपनी वाणी को
बुला लिया है मां वीणा ने
अपनी पुत्री को
सो गई है वह अब सुकून से
अनंत काल के लिए
अपनी मां की गोद में.....।
डॉ मंजुला पांडेय
Comments
Post a Comment